फिर से वे सपने जगा रही जो

Kusum's Journey " फिर से वे सपने जगा रही जो "तुम्हारे ख़्वाबों में बस रही जो ये कैसी उलझन है डस रही जो ये तेरे वादे हैं सारी रस्में है याद आए सता रही जो तुमने दिया है जो सारी खुशियाँ उसे ही पलकों में सज़ा रही जो मुझे पता अब मिले... [पूरी पोस्ट]
writer Kusum Thakur

कविता

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[24 Apr 2010 06:52 AM]

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