अरी,जरा लल्ला के पावं तो देख

कुछ इधर से  ,कुछ उधर  से सब तरफ खुशी का माहौल था .खास तौर में मेरी माँ कि खुशी तो देखते ही बनती थी.पालने में लिटा दिया गया मुझे .कृष्ण कन्हैया की तरह मैं भी पावं के अंगूठे को चूसने लगा.दादी मुझे देखने आयी,और मुझे देखते ही माँ को आवाज़ दी बहू ,जरा इधर तो आ . माँ आयी और बोली क्या... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक गर्ग
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[24 Apr 2010 00:10 AM]

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