शहर की इमारतें

जज़्बात, ज़िन्दगी और मै छुं रही है आसमां को शहर की इमारतें !और ऊँची होने को बेताब सी इमारतें !!घर कहाँ है, रिश्ते कहाँ, रह गई बस दीवारें !इमारतों के साये मे सिमटती इमारतें !!छुप गए हैं चाँद तारे, आफताब ढक गया !अब तो बस खिडकियों से झांकती इमारतें !!अब जगह नहीं है शहर में इंसानों... [पूरी पोस्ट]
writer Indranil Bhattacharjee ........."सैल"

ghazal

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[01 Mar 2010 09:17 AM]

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