चाहत हंसने की
कहते हैं, कि ग़म से ही होता है ख़ुशी का एहसास !पर करो बंद मुट्ठी तो रेत की तरहफिसल जाता है !!लेकर चाहत हंसने की,रोते रोते आये,ज़िन्दगी के आँगन में;हंसा हंसा कर,रुलाती है !अब, डर लगने लगा है,ख़ुशी की आहट से !न जाने कितने ग़म छिपे होंगे उसके आँचल में...
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Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
kavita
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[11 Mar 2010 19:18 PM]



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