उलझन में हूँ
खिजां भी देखी है मैंने तो, देखी है बहार भी !मैदाने जंग में देखी है जीत भी है हार भी !!रूक रूक के आँखों से कैसे टपकता है अश्के ग़म !पानी देखा है ठहरा हुआ, देखी है धार भी !!कहीं ईद-होली है तो कहीं गोधरा-बाबरी !कहीं नफरत पनपते देखा, कहीं दिल में प्यार भी...
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Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
ghazal
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[07 Apr 2010 04:36 AM]



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