तृष्णा बनकर आए कोई

नीरव कोई आए-सहलाए मेरे घावों कोजर्जर तन था पहले हीउस पर ये असीम प्रहारबना निर्दयी जब जग सारालगता कोई नहीं हमाराकोई आए-सहलाए मेरे घावों कोयुग बीते कुछ न लिख पायाखालीपन जीवन में छायाप्रेरणा बनकर आए कोईभर जाए जो रिक्त भावों कोकोई आए-सहलाए मेरे घावों कोकुछ भी... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. राजेश नीरव
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[23 Apr 2010 22:35 PM]

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