सरफ़रोशी के हम गीत गाते रहे...
मुस्कराते रहे, ग़म उठाते रहेसरफ़रोशी के हम गीत गाते रहेरोज़ बसते नहीं हसरतों के नगरख़्वाब आंखों में फिर भी सजाते रहेरेगज़ारों में कटती रही ज़िन्दगीख़ार चुभते रहे, गुनगुनाते रहेज़िन्दगीभर उसी अजनबी के लिएहम भी रस्मे-दहर को निभाते रहे-फ़िरदौस ख़ान...
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फ़िरदौस ख़ान
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[23 Apr 2010 21:51 PM]



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