ये रात है बड़ी

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... ये रात है बड़ी, मंजिल कहीं नहीं.यहाँ काफिले बहुत, माज़ी कहीं नहीं.इस खुदाई रात में हम आसमां देखते रहे,कुछ तारे जगमगाते रहे कुछ यूँही टूटते रहे.ये रात है बड़ी, मंजिल कहीं नहीं. यहाँ काफिले बहुत, माज़ी कहीं नहीं.उफक तक देखते रहे रास्ता तेरा,अँधेरा कर गया... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

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[23 Apr 2010 14:47 PM]

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