जगत में छ: श्रेणी के लोग होते हैं, प्रथम श्रेणी उनकी है, अर्थात सबसे निकृष्ट कहा जा सकता है, कि वह जो दूसरों के केवल दोष ही देखे।
श्रीमद्भागवतम स्कन्ध ४ श्लोक १२ दोषान परेशान हि गुणेषु साधवो गृहन्नति केचित न भवाद्रिशु द्विज गुणांस च फ़लगुन बहुलि परिष्णवो महत्तमास तेषु अविदत्त भवान अगम । दोषान – दोष, परेशां – दूसरों के, हि – लिये, गुणेषु – गुण के अंदर, साधवा: - साधु, गृहन्नति –...
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Vivek Rastogi
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[23 Apr 2010 14:02 PM]



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