ग़ालिब तृप्ति के नहीं, तृष्णा के कवि

मिर्ज़ा ग़ालिब जब ग़ालिब युवा थे तब उनके उस्ताद ने उनसे कहा था, "शकर का मज़ा चख लेना मगर मक्खी बनकर शहद पर कभी न बैठना, नहीं तो उड़ने की शक्ति बाकी नहीं रहेगी ।" यह बात ग़ालिब के ह्रदय में पैठ कर गयी । यही उनके जीवन की रीड की हड्डी है । उन्होंने एक ही जगह बैठकर पीना, एक... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :
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[23 Apr 2010 08:20 AM]

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