ग़ालिब तृप्ति के नहीं, तृष्णा के कवि
जब ग़ालिब युवा थे तब उनके उस्ताद ने उनसे कहा था, "शकर का मज़ा चख लेना मगर मक्खी बनकर शहद पर कभी न बैठना, नहीं तो उड़ने की शक्ति बाकी नहीं रहेगी ।" यह बात ग़ालिब के ह्रदय में पैठ कर गयी । यही उनके जीवन की रीड की हड्डी है । उन्होंने एक ही जगह बैठकर पीना, एक...
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अनिल कान्त :
Mirza Ghalib
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[23 Apr 2010 08:14 AM]



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