बेचैन सी हैं पलकें शायद
बेचैन सी हैं पलकें शायद। रोई हैं बहोत आंखें शायद।कुछ देर तो बैठें साथ कभी, कुछ प्यार की हों बातें शायद्॥जो शीश'ए दिल कल टूट गया, चुभती हैं वही किरचें शायद्॥इस बार गुज़ारिश फिर से करूं, मंज़ूर वो अब कर लें शायद॥कैफ़ीयते-दिल पहचानती हैं,मग़मूम हैं ख़ुद...
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युग-विमर्श
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[23 Apr 2010 07:55 AM]



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