जिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहा--
वो घड़ी हर घड़ी याद आती रहेगम भुलाकर जो खुशियाँ सजाती रहेजिन्दगी से अगरबत्तियों ने कहाराख बन के भी खुशबू लुटाती रहेकभी सुनता क्या बुत भी इबादत कहींघण्टियाँ क्यों सदा घनघनाती रहेप्यार सागर से यूँ है कि दीवानगीमिल के खुद को ही नदियाँ मिटाती रहेडालियाँ सूनी...
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श्यामल सुमन
कविता
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[23 Apr 2010 05:23 AM]



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