किसी दिन कहीं मेल होगा यकीनन
किसी दिन कहीं मेल होगा यकीननमुहब्बत नहीं सिर्फ़ धोखा यकीनननयी सोच दीवारसे क्या रुकेगीमिलेगा हवा को झरोखा यकीननसुकून-ए-जिगर अब तलक मिल न पायाअभी चेहरे पर है गोषा यकीननबहारोंमें हम सर्द आहों के मारेकिसी संगदिल का है बोसा यकीननखुली नींद क्यों शेषशायी...
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मिलिंद / Milind
ग़ज़ल
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[23 Apr 2010 03:20 AM]



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