“लोग क्यों?:डॉ.राजकिशोर सक्सेना राज”
लोग क्यों? बिन कोई ठोकर लगे ही, लड़खड़ाते लोग क्यों? परकटी चिड़िया से खुद ही, फड़फड़ाते लोग क्यों? जानकर लेते मुसीबत, खेलते फिर शौक से, जब लिपट जाती गले से, चिड़चिड़ाते लोग क्यों? असलियत सबको पता है, जानते हैं लोग सब, बेवजह महफिल में बेपर की, उड़ाते लोग...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[23 Apr 2010 00:04 AM]



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