कालेज के स्टुडेंट - काका हाथरसी
फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸ लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट। कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸ दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती। कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸ मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ घिसते फादर। पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन...
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पियूष अग्रवाल
कविता
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[22 Apr 2010 16:12 PM]



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