ते जानहु निसिचर सम प्रानी

ऋषभ उवाच मित्रो!कभी हम अपने आचरण पर सोचकर देखें तो ऐसा क्यों लगता है कि हम देवत्व की सारी संभावनाओं के बावजूद मनुष्य भी नहीं रह पाए हैं - राक्षस होते जा रहे हैं - रावण हो गए हैं। जिस परिवेष में हम जी रहे हैं( कभी-कभी तो लगता है - रावणराज्य में जी रहे हैं।... [पूरी पोस्ट]
writer ऋषभ Rishabha
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[22 Apr 2010 15:19 PM]

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