मन की बात..
रहते-रहते आती है जाने कहां से आती है, कि गहीन अंधारे सन्न् सुबेर हो जाता हूं, सिर नवाये, घबराये लजाये के कंगलई में कुबेर. बरसाती नाला-सा भहर बहा आता है, बेहयायी हंसी-बसी पुलकदायी खुशी में समूचा ढेर, मुलतानी पठान, विज्ञापन फ़िल्मों का बबर शेर हो जाता...
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Pramod Singh
ब्लॉगिंग
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[22 Apr 2010 14:21 PM]



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