हकीकत की आंधी
उदासी की गलियां तो
जानी पहचानी थीं
फिर भी इमामबाड़े की
भूलभुलैयाँ की तरह
भटक गया है मन
थक हार कर आखिर
जा बैठा है
ख्वाहिशों के दरख्त के नीचे
जहाँ चाहतों के पत्ते
झड़ झड़ कर
गिर रहे हैं.
और
उड़ते जा रहे हैं
निरंतर दिशाहीन से
हकीक़त की आंधी...
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sangeeta swarup
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[22 Apr 2010 11:37 AM]



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