जलन -यह -कैसी -जलन ..!!!
थी चांदनी तारों के आगोश में ,देख!चाँद जल गया ! जलन भी थी इतनी तेज, सूरज भी पिघल गया ! तपिस तेरे मेरे प्यार की, पहुंच गयी कूंचों तक ! बारास्ता जो भी गुजरा इधर से ,वो भी मचल गया ! ऐसा नही की विरानियाँ ही हैं, इस राहे-गुजर में , जो भी आया दर-ए-इश्क में...
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कमलेश वर्मा
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[22 Apr 2010 11:24 AM]



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