इस गणतन्त्र के जन में इनका शुमार क्यों नहीं?

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ क्योंकि हम ऐसा चाहते हैं।बहुत ईमानदारी के साथ हम महसूस करते हैं, इसकी पुख्ता वजूहात हैं - वो देखने में हमारे जैसे इंसान ही लगते हैं।हमारे जैसा महसूस करते हैंहमारी तरह रोना-हँसना भी जानते हैंहमारी ख़ुशी में शरीक होते हैं अपना पेट पालने के लियेनाचते हैं और... [पूरी पोस्ट]
writer huda
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[22 Apr 2010 09:13 AM]

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