झूठ और सच
झूठ के पांव होते ही नहीं हैं ,कभी कहीं भी पहुंच सकता है।पर बिना पांव के ही भला वह , फासला क्या तय कर सकता है ?भटकते भटकते , भागते भागते , उसे अब तक क्या है मिला ?मंजिल मिलनी तो दूर रही , दोनो पांव भी खोना ही पडा !!सच अपने पैरों पर चलकर , बिना...
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संगीता पुरी
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[22 Apr 2010 08:34 AM]



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