आयी आवाज कानों को छूती हुई .....
शुष्क हवा का झोंका चेहरा सहला गया .............तभी आयी आवाज कानों को छूती हुई; उठ जा बेटा, तेरी सुबह हुई .........हवा ठंढी सी है, सुबह भींगी हुई; घंटी पूजा की कानों में कुछ कहती हुई ........कहाँ हो-किधर हो; अब कैसी शरम; उफ़! बड़ी दुविधा!! था, ये सारा भरम...
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Vishal Kashyap
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[22 Apr 2010 07:13 AM]



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