उम्र बीती, गुत्थियाँ सुलझी नहीं

कुछ इधर से  ,कुछ उधर  से झर गए वे पातजो पीले हुएव्यर्थ ही फिरपलक क्यों गीले हुए।साँस तो,जो आ गई है, जाएगीप्यास मरु कीकब तलक भरमाएगीएक कतरामिट गया बादल बनासर बना सरिता बनासागर बनापर मिली पाती गगन सेनेह की,ह्रदय उमड़ापंख सपनीले हुए।फिर,नया आँचललरजती लोरियाँहाथ तारेपाँव रेशम... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक गर्ग

अज्ञात

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[22 Apr 2010 04:59 AM]

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