ग़ज़ल
हसरत ए नाकाम को क्या क्या कहिये /दर्द की चोट है ये ,इस चोट को कैसे सहिये?//सारे चेहरों पे पुता है ये उदासी का ज़हर /उनके चेहरों पे नकाबें हैं ये किस से कहिये ?//घर में बैठें हैं उजाले भी लूट के डर से /इतनी दहशत है तो इस मुल्क मे...
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डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह
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[22 Apr 2010 02:35 AM]



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