प्रीत की प्रत्याशा
रे कवि अब बदल लेअपनी कविता की भाषाजिसके लिए तू जनम भरदर्द को पीता रहाजिनके लिए तू जनम भरअश्क बन जीता रहादेख वो मनमीत तेरेदेख वो हमप्रीत तेरेतेरे घावों पर नमक छिड़कमंद-मंद मुस्कुरा रहे हैंक्या अब भी रखता है तूइनसे प्रीत की अभिलाषाजिनके लिए तू जनम भरकोयल...
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डॉ. राजेश नीरव
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[21 Apr 2010 22:43 PM]



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