है हर ज़िन्दगी का बस यही तो तराना
हर पल में चलना और बस चलते रहना, गिरना, संभालना और उठ खड़े होना,लड़ना, नष्ट होना और लुप्त होकर फिर जन्म लेना,थकना, थक के चूर होना और फिर शुरू हो जाना, रो रो के हसना और हस्ते हस्ते रोना, खोना, मिलना, और फिर गुमशुदा हो जाना,डूबना, उभारना और फिर डूब जाना, रूठे...
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पियूष अग्रवाल
कविता
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[21 Apr 2010 12:46 PM]



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