कर देना फिर मेरी चादर सिंदूरी
आज फिर खोलीजंग लगे ताले से बंधीपुरानी लोहे वाली संदूकभरभराकर ढहा वर्तमानकिस तरह कस रहा अतीतजैसे, फिर आईं तुम बांह में जकड़ने को भागी-भागी सी...लौटी भीगी-भीगी शामपहली-पहली बारिश की बूंदें लेकरउतराई आंख के सामने हर रात की तस्वीरझिलमिलाती हुई...
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चण्डीदत्त शुक्ल
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[21 Apr 2010 12:11 PM]



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