जनाब सरवर की दो गज़लें
गज़ल : न सोज़ आह में मिरी.............. न सोज़ आह में मिरी, न साज़ है दिल में मैं लाऊँ कौन सी सौग़ात तेरी महफ़िल में ? मैं आईना हूँ कि आईना-रू नहीं मालूम ये वक़्त आया है इस आशिक़ी की मंज़िल में ख़ुदी कहूँ कि इसे बेख़ुदी बताओ तुम मैं अपने आप चला आया कू-ए-क़ातिल में...
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आनन्द पाठक
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[21 Apr 2010 10:40 AM]



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