युग-युग जियो डाकिया भैया
युग-युग जियो डाकिया भैया, सांझ सबेरे इहै मनाइत है.....हम गंवई के रहवैयापाग लपेटे, छतरी ताने, कांधे पर चमरौधा झोला,लिए हाथ मा कलम दवाती, मेघदूत पर मानस चोलासावन हरे न सूखे कातिक, एकै धुन से सदा चलैया......शादी, गमी, मनौती, मेला, बारहमासी रेला पेलापूत...
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डाकिया बाबू
कविता
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[21 Apr 2010 09:17 AM]



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