एक मुट्ठी आसमान
रोज़ जब किसी न किसी चौराहे पर ट्रैफिक के चक्रव्यूह मेंकिसी अभिमन्यु को कटा पाता हूँ ,झेलता हूँ अपने ही आसपास खून की कै करते असंख्य लोगों को ,जब मेरे नथुने ताड़का की नाईं ज़हरीला धुयाँ उगलती चिमनियों को देख फडफडा कर दर्शाते हैं क़ि अब दम घुटने लगा है तब...
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नियंत्रक । Admin
ravindra sharma ravi
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[21 Apr 2010 06:30 AM]



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