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zindggii एक जिन्दगी .....नया और कुछ नहीं सिवाए उसके..हाँ इसी के सहारे तो एक घर को छोड़ किसी और का हाथ थामे मैं यहाँ चली आई हूँ...यह कमरा भी शायद पहले कुछ और रहा होगा मेरी ही तरह.....फूलो से सज़ी कमरे की हर शय....दीवार पे उनकी ही लडियां,मेज़ पे बिच्छी पत्तियां,फूलो... [पूरी पोस्ट]
writer aanch
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[21 Apr 2010 04:37 AM]

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