ये खराश-ए-दिल है क्यों
ये खराश-ए-दिल है क्यों , हैं निगाहें लहूलुहानकल शब् तो गुल खिले थे इधर , ईदगाह थेमेरा ही तो दिल नहीं है कि जिसपर सितम हुएतब उनकी निगाहों से जमाने तबाह थेसब वक्त लुट गया मेरा , एक पल भी ना रहाएक दौर था कि हम भी बड़े बादशाह थे...
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Alok Shankar
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[21 Apr 2010 02:40 AM]



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