रंग अपना बदलना छोड़ दो

नीरव मुझको भाता बहुत है साथ तनहाइयों काहो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दोथा नाजुक मगर मुझसे टूटा नहींकाँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दोतुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ाइस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दोकोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगामगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दोजुर्म... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. राजेश नीरव
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[20 Apr 2010 22:33 PM]

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