कहते हो के हम कोई नया ख़्वाब न देखें
कहते हो के हम कोई नया ख़्वाब न देखें।क्या ख़ुद को तसव्वुर में भी शादाब न देखें॥क्यों अपने शबो-रोज़ से हम मूंद लें आँखें,कैसे तेरी जानिब दिले-बेताब न देखें॥साहिल पे चेहल-क़दमियाँ करते रहें दिन-रात,बस कैफ़ियते-माहिए-बेआब न देखें॥आँगन में उतर आये अगर रात...
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युग-विमर्श
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[20 Apr 2010 22:03 PM]



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