कब तक यह सिलसिला चलेगा

स्वप्नलोक शाम ढले आ बैठा घर में,अतिथि एक अनजाना ।मुस्काया वह बता स्वयं को,मेरा मित्र पुराना ॥बोला, "यूँ क्यों घूर रहे हो,क्या अब तक हो रूठे ?बात-बात पर गाल फुलाते,तुम हो बड़े अनूठे ॥ बड़े दिनों से चाह रहा था,तुमसे मिलने आना ।मौसम अब अनुकूल हो गया,मैंने कल ही... [पूरी पोस्ट]
writer विवेक सिंह
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[20 Apr 2010 21:33 PM]

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