आवारा ग़ज़ल
ये इंसानों का जंगल है यहाँ सब छूट जाते हैंबनाकर राह्बर का भेस, रह्ज़न लूट जाते हैं.सफर कब खत्म होगा रूह का ये कौन बतलाएये बढ जाती है आगे जिस्म पीछे छूट जाते हैं.किसी मासूम बच्चे की तरह ये शेर हैं नाज़ुकज़रा सा मुँह चिढाकर देख लो यह रूठ जाते हैं.वो पढकर...
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SAMVEDANA KE SWAR
ग़ज़ल
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[20 Apr 2010 16:49 PM]



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