ग़ज़ल
कैसे कहूं की कशमकश में परेशां है आदमी महफ़िल ए दौरां की अब वजह बची कँहा उठ रही है बास हर तरफ ज़र्द शिगुफों की सोचे जहन में ताजगी की मीठी सुगंध कँहा हो रहे हैं तार तार रिश्ते हर घड़ी इंसानी रिश्तों सी अब आबो हवा...
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jagdeep singh
ग़ज़ल
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[20 Apr 2010 12:43 PM]



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