माफ़ी चाहती हूँ लिखना ही पड़ा... अब झेल नहीं पा रही हूँ ये तमाशा...

काव्य मंजूषा माफ़ी चाहती हूँ लिखना ही पड़ा...अब झेल नहीं पा रही हूँ ये तमाशा...कई दिनों से ये तमाशा देख रही हूँ...बदतमीज़ी  की सारी हदें पार कर रहे हैं लोग ... हमारी एक बहन ने अपनी बात अपनी डायरी  में क्या कही और लोगो के पेट में मरोड़ होने लगा... अब उसके नाम... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[20 Apr 2010 12:07 PM]

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