पन्नों पर नमी है
कवर पर चढ़ी जिल्द... पपड़ाई है ...कमरे की सफेदी की तरह ...जो उतरना चाहती है...पर उतरी नहीं है...हाशिये पर कई...कटे-फटे से अक्षर हैं...पर नाम कोई नहीं है...सबसे पीछे वाले पन्ने पर ...आड़ी-तिरछी रेखाएं...खिंचीं हैं...अलग-अलग रेडियस वाले...कई अधबने वृत...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[20 Apr 2010 11:48 AM]



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