ये क़ाफ़ेला ख़्वाबों का कभी काम न आया
ये क़ाफ़ेला ख़्वाबों का कभी काम न आया। सरमाया उमीदों का कभी काम न आया॥अच्छा है के था अपनी ही कोशिश पे भरोसा,कुछ मशवेरा यारों का कभी काम न आया॥सूरज की शुआएं मेरे आँगन में न उतरीं,मंसूबा उजालों का कभी काम न आया॥लिप्टी थी मेरे जिस्म से यूं गाँव की...
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युग-विमर्श
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[20 Apr 2010 11:14 AM]



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