शब्दो का कलरव
मेरा क्षुब्ध मनकई बार मुझसेबगावत करता हैमुझसे अनुरोध भीकरता है..बार बार मचलताऔर रूठ्ता है .मुझे उत्तेजित भी करता हैकि इस के भीतर केअंतर्द्वंद कोशब्दो सेबिखेर दू..आंखे प्रणय-कलहउत्पन्न करती हैंबुद्धीकुछ सुनना नही चाहतीमैं इस झगडालू कुटुंब कोसमझाती हुं ....
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अनामिका की सदाये......
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[20 Apr 2010 09:27 AM]



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