॥ हे दुनिया वालो॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : आठ)साल वृक्ष की कोंपलों पर बैठेक्यों मिरू पाखी, तुम ही रोया करोगे?गोरार लताओं की झाड़ी मेंकारे पाखी, तुम्हारी छाती की धड़कन हीक्यों सुनाई देती है?हे दुनिया वालो, मैं ही रोता हूंक्योंकि साल वृक्ष की डाल टूट गई हैहे भाई, मेरी...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[20 Apr 2010 05:10 AM]



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