गले मिलें तो साथ धड़कने भी मिलें

असुविधा (आमतौर पर मान लिया जाता है कि मुक्त छंद लिखने वाले छंद से दूर ही रहते हैं। मेरा मानना है कि हम सबने किशोरावस्था और तरुणाई के पहले सालों में गीत, नज़्म,ग़ज़ल, दोहे लिखे होते हैं…बस एक समय के बाद वह फ़ार्म अपर्याप्त लगने लगता है। आज पढ़िये उसी दौर की एक... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक कुमार पाण्डेय

नज़्म

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[20 Apr 2010 01:13 AM]

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