एक असमाप्त कविता शृंखला के आरंभिक ड्राफ़्ट
अरुंधति(एक)जेठ की रात मेंछप्पर के टूटे खपड़ैलों से दिखता था आकाश अपनी खाट पर डेढ़ साल से सोई मां की मुरझाई सफेद-जर्द उंगली उठी थीएक सबसे धुंधले, टिमटिमाते, मद्धिम लाल तारे की ओर ‘वह देखो अरुंधति !’मां की श्वासनली में कैंसर था और वह मर गई थी इसके बादउसकी...
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Uday Prakash
कविता
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[19 Apr 2010 23:53 PM]



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