वैशाख ॠतु भा गई,भर गए बाज़ार नक़ली माल से,औ के कर गई बा !?

शस्वरं वैशाख चल रहा है !निराली महिमा है , अलग ही ठाठ-बाट हैं वैशाख मास के । और इस बार तो एक नहीं , दो-दो वैशाख हैं ।प्रस्तुत है एक कवित्तनए भाव-बिम्ब , पुराने छंद के... [पूरी पोस्ट]
writer Rajendra Swarnkar
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[19 Apr 2010 16:28 PM]

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