स्वप्निल राह

बावरा मन जीवन की राहों में कई बार कदम कुछ ऐसी राह पकड़ लेते हैं जिसकी कोई मंजिल नहीं होती या यूं कहो कि मंजिल सपना बन जाती है और वो राह स्वप्निल ।स्वप्निल राह जीवन की सच्चाई से अनभिज्ञ वो बढ़ती जा रही थी स्वप्निल रास्तों के गांव लेकर विचारों की छांव कदम पर आई ठोकर... [पूरी पोस्ट]
writer सुमन'मीत'
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[19 Apr 2010 14:04 PM]

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