मेरी कमीज !

दिल से मेरी कमीज  जिसकी जेब  अक्सर खाली रहती है और मेरी कंगाली पर  हंसती है, मैं रोज सुबह  उसे पहनता हूँ रात को पीट पीट कर  धोता हूँ  और निचोड़कर सुखा देता हूँ शायद उसे  हंसने की सजा देता हूँ !... [पूरी पोस्ट]
writer nilesh mathur
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[19 Apr 2010 12:59 PM]

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