सरकार अपना भरोसा खो चुकी है

दख़ल जिंदगी की कीमतें रुपयों से नहीं चुकायी जा सकती। चाहे वह 40 लाख हो या उससे भी अधिक। आदिवासियों की जिंदगी की भी और सेना के जवानों की भी। न ही किसी की जिंदगी को कम करके आंका जा सकता है – पर यह होता रहा है। स्थान, व्यक्ति, वर्ग के लिहाज से घटनाओं की महत्ता... [पूरी पोस्ट]
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माओवाद के बहाने

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[19 Apr 2010 05:36 AM]

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