कभी-कभी मै मजबूर हो जाता हूँ सोचने को कि,ऐसा भी हो सकता है क्या?(कविता),
मानवीय संवेदनाये कब-कहाँ क्या रूप धर ले इसे समझना अभी तक काफी मुश्किल रहा है,मेरे लिए तो कम से कम!नहीं मालूम खुद का भी तो औरो को तो क्या ख़ाक जान पाऊंगा मै!फिर भी शब्दों के सहारे कभी खुद को कभी किसी और को समझाने निकल पड़ता हूँ जी!या यूँ कहे कि शब्द खुद ही...
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kunwarji's
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[19 Apr 2010 01:44 AM]



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